जर्मन के जगह संस्कृत को अनिवार्य बनाना समझदार सरकार का बचकाना कृत्य है

तो सरकार ने केन्द्रीय विद्यालय में जर्मन हटा के संस्कृत पढ़ाने का निश्चय कर लिया है। ज़ाहिर है बहुत से संगठनों को यह पसंद भी आया होगा और बहुत से ऐसे भी होंगे जिन्हे यह नागवार गुजरेगा। अभी हाल के ही हाई कोर्ट ने इस फैसले पर वर्तमान सत्र के लिए रोक लगा दी है।

छात्रों को क्या पढ़ना चाहिए?

यह तो अपने आप में ही एक गंभीर विषय और बहस का एक मुद्दा है। पर मेरे विचार से यह रोजगारपरक और विचारोंन्मुखी होना चाहिए। इससे छात्र दो रोटी का जुगाड़ कर सकें और एक बेहतर – जागरूक व्यक्ति बन सके।

मैंने कई ऐसे लोगों के बारे में सुना है जिनके माता – पिता एक अच्छे पद पर हैं और जिनके बच्चे इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की पढाई कर बैंकों में कलर्क की नौकरी कर रहे होते हैं। मजे की बात तो यह है जब यह सुनने को मिलता है कि उनकी इस(!) सफ़लता के पीछे निर्मल बाबा सरीखे लोगों का हाथ होता है। इसी से मुझे भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति का पता चल जाता है।

बेहतर तो होता कि सरकार सभी ज़िला मुख्यालयों में एक भाषा विद्यालय का गठन करती या केंद्रीय विद्यालयों में एक भाषा सम्बन्धी विभाग होता जो स्वतंत्र रूप से उस विद्यालय और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप 6-7 भाषाओँ का चयन करता और न ही सिर्फ केंद्रीय विद्यालय बल्कि अन्य विद्यालयों के छात्रों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता था। इससे विद्यालयों को आवश्यकता के अनुरूप हर भाषा के छात्र मिल जाते। कुछ रोजगार भी पैदा होता और छात्रों को विकल्प भी मिल जाता।

संस्कृत से किसे फ़ायदा?

बहुतों को कष्ट होगा, पर मेरे विचार से संस्कृत कभी भारतीयों की भाषा नहीं रही। यह सिर्फ एक खास वर्ग की भाषा थी और उन्हीं तक सीमित रही। ज़ाहिर है पीछे वही वर्ग ज़िम्मेदार है। क्या ऐसा नही है? अब क्यों संस्कृत को लेकर इतनी तड़प है? आप भाषा किसी पर थोप नहीं सकते। ऐसा करने में आप सफल भी नहीं होंगे।

संस्कृत को इस तरह से पढ़ाये जाने से सिर्फ उन्ही राजनीतिज्ञों को फ़ायदा है जो ख़ुद को हिंदूवादी या राष्ट्रवादी कहलवाना पसन्द करते है पर उनके पास न ही हिन्दुओं के लिए और न ही अपने राष्ट्र के लिए कोई ठोस विज़न है। हालांकि यह भी सोचने वाली बात है की उन्हें कितना फ़ायदा होगा।

क्या संस्कृत का उत्थान होगा?

अजी छोड़िये, बेकार की बहस. संस्कृत को अनिवार्य बना कर आप इसका विकास नहीं शिक्षा का स्तर गिरा रहे हैं। जर्मन के जगह संस्कृत को अनिवार्य बनाना समझदार सरकार का बचकाना कृत्य है।  इससे तो अच्छा होता कि वर्तमान शिक्षा को रोजगारपरक बनाने के ठोस उपाय किये गए होते। हमारी सभ्यता विकसित थी। इसने जरूर दुनिया को रौशन किया होगा पर वर्तमान स्थिती यही है कि भारत के विकासशील या पिछड़ा देश है। हम अपने इतिहास का दम्भ भर सकते है पर सच्चाई यही है कि हम अपने कृत्यों से अपने भविष्य को तार – तार कर रहें हैं।

ब्रिटिश राज ने हमसे यक़ीनन हमसे बहुत कुछ छीना है पर उसने हमे बहुत कुछ दिया भी है। बेहतर तो यही होता की हम संस्कृत के बजाय एक भारतीय भाषा पढ़ाते; या विदेशी भाषा ही। कम से काम उसकी कोई उपयोगिता तो होती। इसमें संस्कृत भी एक हो सकती थी।

तो क्या किया जाना चाहिए?

करने को तो बहुत कुछ किया जा सकता है। एक तो मैंने ऊपर कहा। यह तो सरकार पर निर्भर करता है कि वह क्या सोचती है। अब आप ही बताईये कि, आज, 21 वीं सदी में केन्द्र सरकार के पास संसाधन की इतनी कमी है? वह भी तब जब तमाम सब्सिडी कम या खत्म किए जा रहें हैं। जर्मन भाषा को एक बार में हटा कर संस्कृत पढ़ाया जा सकता है वह भी इसी सत्र से। विभिन्न माध्यमों से सरकार यह इच्छा तो दिखाती है कि वो जनता के लिए विशेष करना चाहती है और जनता को भी इसमें भागीदार बनाना चाहती है पर वह संस्कृत को पढ़ाने के लिए इतनी व्याकुल क्यों हो जाती है कि वह आधे सत्र का भी इंतजार नहीं कर सकती। क्या यह उन बच्चों भविष्य साथ खिलवाड़ नहीं है? क्यों कोर्ट को इस मामले को पलटना पड जाता है?

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